धुआं धुआं हुआ
उस गली का झोंका
जो कभी गुलाब सा महेकता था
खोया हुआ है अब
उस देश का सूरज
आज न जाने कहाँ ढले
कभी दर्जनों कोयलें
एक साथ उड़ान भर्ती थीं जहाँ
आज एक कौवे तक को
नज़र तरसती है
चांदनी रातों में
उस शहर की चौबारें
घुँघरुओं की बौछार
से चहकती थी
तीन पहर से यहीं बैठा हूँ
न जाने कहाँ दफ़्न हैं
वह ग़ज़लें, क़व्वालिआं, कफी
आज जब कदम ठहरते हैं
शुष्क चौखटों पर, चेहरों पर
ऐसा प्रतीत होता है
मानो पूछते हों
“कौन आया है?”
उनकी उजड़ी बस्ती को और विरान करने
इस शहर की यह हालत देख
मेरे दिल से निकली हर आह
झूठी क्यों लगती है इन्हें?
किसी के साथ की चाह नहीं
बंजारापन ही अपना
क्यों लगता है इन्हें?
आया तो था पुराने दोस्त को मिलने
पर किवाड़ बंद कर वह बोला
“जाओ, एक दोस्त ने ही छला है हमें।”

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आशा सेठ