जैसे है पीला सूरज का नीला आकाश का हरा बरसात का सफ़ेद सर्दी का जैसे है भूरा धरती का नारंगी शूर का लाल प्रेम का काला झूठ का वैसे ही रंगी हूँ तुझ में सदा के लिए तेरे बिना मेरी पहचान क्या? तुझसे जुदा मेरा अस्तित्व क्या? ~~~~~ आशा सेठ

मत पूछो हमसे की दिल का हाल क्या है... क्या करे बेचारा इसकी ख्वाहिशें बेशुमार हैं... ~~~~~ आशा सेठ

किस गली जाकर छुपूँ की तेरी यादें पीछा करना छोड़ दें हर नुक्कड़ पर इनका बसेरा है हर चौराह इनका मेला भरा रात ठहरूं चाहे जहाँ सुबह इन्ही की बाहों में होती है सोचता हूँ, मैं हूँ यहीं या बस इनकी सिलवटों में गुम कहीं तेरे जाने से जो गम न हुआ वह इनकी साथ... Continue Reading →

धुआं धुआं हुआ उस गली का झोंका जो कभी गुलाब सा महेकता था खोया हुआ है अब उस देश का सूरज आज न जाने कहाँ ढले कभी दर्जनों कोयलें एक साथ उड़ान भर्ती थीं जहाँ आज एक कौवे तक को नज़र तरसती है चांदनी रातों में उस शहर की चौबारें घुँघरुओं की बौछार से चहकती... Continue Reading →

पुरानी यादों को निचोड़कर कभी ख़ुशी तो कभी ग़म पी लिया करते हैं जब याद तुम आते हो दुनिया से छिपकर रो लिया करते हैं अपनी खामियों पर खुद को जी भरके कोस लिया करते हैं जब याद तुम आते हो दुनिया से छिपकर रो लिया करते हैं तुम्हारे वादों में ज़िन्दगी का मकसद ढूंढ... Continue Reading →

सुबह जब घर से निकलता उसका चेहरा दिल में लिए चलता रास्ते भर यही सोचता कब तक ऐसे चलेगा फटे पुराने चप्पल रास्तों से लड़ते इसी तरह रोज़ गुज़ारे की तलाश में दिन से रात रात से दिन करता शाम को जब घर लौटता वो बैठी रहती पैर पसारे मेरा इंतज़ार करते मुझे देख मुस्कुराती... Continue Reading →

मत कहो यह किस्मत की बात है... जहां बारातों में हज़ारों के निवाले कूड़े दान को खिलाये जा रहे हैं पर एक पिता अपने परिवार को दो वक़्त की रोटी तक को खून बहा रहा है मत कहो यह किस्मत की बात है... की बंद घरों में दीवारों पे लटकी तसवीरें घंटो ऐसी का हवा... Continue Reading →

कभी जो…

कभी जो नज़रें मिलीं पलकें झुका न लेना कभी जो मेरी यादों ने दस्तक दी उन्हें ठुकरा न देना उम्मीद लिए देहलीज़ पर खड़ा हूँ इस इंतज़ार में कब मेरी गली से गुज़रोगे कभी जो मेरी आवाज़ सुनो अजनबी कहकर मुँह फेर न लेना ~~~~~ आशा सेठ

घर

दीवारों की दरारों में छुपी ज़र्द यादें पास जाकर देखा कभी मेरा बचपन सतह पर तैरता कभी दादी का बुढ़ापा कनखियों से झाँकता खिड़कियों के पार से सन्नाटे ताकते कभी होली में रंगे माँ-बाबा की झलक तो कभी बिदाई में सजी अन्नू का अक्स खाली कमरों में गूंजते हँसी के पटाखे कभी पापा के ठहाके... Continue Reading →

कल…

चलते चलते कदम नहीं थकते ठहर जाने से थकते हैं यह सोचकर परेशान नहीं दिल की कल की सुबह आज सी नहीं होगी पर इस सोच में डूबा रेहता है की आज की शाम कल सी हुई तोह क्या डर इस बात का नहीं की कल अपने मुँह मोड़ लें फिक्र इस बात की होती... Continue Reading →

बसेरा…

चुपके से दबे पाओं आकर मेरे दिल में तुम्हारी बातें कुछ ऐसे बसेरा कर गयीं की आज मुझसे ज़्यादा कहीं तुम हो झलकती उन आइनों से जिनमें मैं कभी खुदको तलाशता था ~~~~~ आशा सेठ

सुनहरी यादें…

सूरज की लौटती किरणों के संग हताश तन्हाईयाँ वापस लौट गयीं सुनहरी यादों से लिपटी यह शाम एक बार फिर हमें ज़िंदादिल कर गयी... ~~~~~ आशा सेठ

उस रोज़…

उस रोज़ जब नींद ने अलविदा कहा ऐसा लगा बरसों पुराने किसी दोस्त से बिछड़ना हुआ खुद को जब आईने में देखा ऐसा लगा किसी अजनबी से मुलाकात हुई हस्ते हुए चेहरे के पीछे उस अक्स को पहचान न सकी आंगन में कबूतरों की गुटर गु कुछ नागवार सी लगी उनकी आवाज़ उदासीन सी लगी... Continue Reading →

पतझड़ और वो…

जब मिले हम उस पतझड़ से कुछ इस कदर डूबे उसकी ख़ूबसूरती में की यह पूछना भूल गए वह आएंगे भी या बस उनकी यादें साथ लाये हो उसकी बाहों में सिमट यह बोलना भूल गए इंतज़ार हमें वो करवाते हैं पर हमारी तन्हाई को सीने से तुम लगा लेते हो ~~~~~ आशा सेठ

एक सफरनामा ऐसा भी …

एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ भीगी बारिशें तो हैं पर नमी में लिपटी मुरझाई यादें भी... एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ मुलाकातें तो हैं पर होटों पे सिमटी ज़र्द ख्वाहिशें भी... एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ हर वक़्त हलचल तो हैं पर पल पल पे जमी ख़ामोशी की झिल्लियां भी... एक सफरनामा ऐसा भी... जहाँ... Continue Reading →

वो पापा ही थे …

बारिश की उन रातों में डूबे हुए नम यादों में घूँट घूँट उन घंटों को पीते थे हाँ, वो पापा ही थे सुबह की न होश न खबर सूरज की किरणों से परहेज कर खाली बोतलों में अधूरे सपनों को समेटते थे हाँ, वो पापा ही थे ख्वाहिशों की शैय्या से दूर बुने अपने बेशर्त... Continue Reading →

जब निकले खुदको ढूंढने…

हर पल तेरी ही यादों में खोये जाने कब हम खुदसे ही बेगाने हुए शब्द तो मेरे थे पर ज़िक्र तेरा शहर तो मेरा था पर बसेरा तेरा जब निकले खुदको ढूंढने हर गली में मुलाकात हुई तुझसे सोचा तुझसे ही खुद का पता पूछ लूँ पर तेरी गलियों में इस कदर गुम हुए मानो... Continue Reading →

ख्वाहिश बस इतनी सी थी…

रात की खामोशियों को चीरती हुई एक आवाज़ गूंजी जानी पहचानी सी उस शोर की तलाश में कदम मेरे कभी अंधेरों का पीछे करते कभी तेरी यादों का ~~~ सन्नाटों से लैस एक चौराहे पर फिर दूर खड़ी तेरी परछाई मुझे देख मुस्कुरायी हज़ारों सवाल लिए मेरी नज़रें तेरा मन टटोलती रहीं सेहमी सी तेरी... Continue Reading →

उस रात की बात …

क्या बताएं तुम्हें उस रात की बात चौखट पे बैठे अतीत की चादर में लिपटे किस कदर हम ख्वाहिशों को तरसे ~~~ क्या बताएं तुम्हें उस रात की बात होठों को सीए खामोशियों की बाहों में सिमटे किस कदर हम अल्फ़ाज़ को तरसे ~~~ क्या बताएं तुम्हे उस रात की बात खुद से गुफ्तगू करते... Continue Reading →

आज भी…

यादों की जीर्ण दीवारों पर आज भी तस्वीर तेरी लगी है कुछ चंद लम्हों को संजोती आज भी निगाहों में नमी हैं रात की बेसब्र खामोशियों में आज भी सदाएं तेरी गूंजती हैं कुछ चंद लम्हों को संजोती आज भी निगाहों में नमी हैं मौसम के रंगीन चेहरों पर आज भी अक्स तेरी सजी है कुछ... Continue Reading →

एक शाम वक़्त के नाम…

कई सुबह कई शामें गुजरीं वक़्त के कदम कभी न रुके एक पल में सदियाँ बदल गयीं कई सदियाँ एक पल में सिमटे ~~~ इस पहेली में गुम यह सोचा ज़रा फुर्सत से बैठें वक़्त को मुट्ठी में थाम उससे दो बातें करें हमने कहा: "आओ, ज़रा बैठो कुछ किस्से हमें भी सुनाओ अनकहे अनसुने... Continue Reading →

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