जब निकले खुदको ढूंढने…

हर पल तेरी ही यादों में खोये जाने कब हम खुदसे ही बेगाने हुए शब्द तो मेरे थे पर ज़िक्र तेरा शहर तो मेरा था पर बसेरा तेरा जब निकले खुदको ढूंढने हर गली में मुलाकात हुई तुझसे सोचा तुझसे ही खुद का पता पूछ लूँ पर तेरी गलियों में इस कदर गुम हुए मानो…

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ख्वाहिश बस इतनी सी थी…

रात की खामोशियों को चीरती हुई एक आवाज़ गूंजी जानी पहचानी सी उस शोर की तलाश में कदम मेरे कभी अंधेरों का पीछे करते कभी तेरी यादों का ~~~ सन्नाटों से लैस एक चौराहे पर फिर दूर खड़ी तेरी परछाई मुझे देख मुस्कुरायी हज़ारों सवाल लिए मेरी नज़रें तेरा मन टटोलती रहीं सेहमी सी तेरी…

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