घर

दीवारों की दरारों मेंछुपी ज़र्द यादेंपास जाकर देखाकभी मेरा बचपनसतह पर तैरताकभी दादी का बुढ़ापाकनखियों से झाँकताखिड़कियों के पार सेसन्नाटे ताकतेकभी होली में रंगेमाँ-बाबा की झलकतो कभी बिदाई में सजीअन्नू का अक्सखाली कमरों में गूंजतेहँसी के पटाखेकभी पापा के ठहाकेतो कभी दादा केकहानी-किस्सेएक एकड़ उस ज़मीं मेंहज़ारों यादें दफ़्नकभी वो मन बहलातेतो कभी कितना तरसाते

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जब निकले खुदको ढूंढने…

हर पल तेरी ही यादों में खोये जाने कब हम खुदसे ही बेगाने हुए शब्द तो मेरे थे पर ज़िक्र तेरा शहर तो मेरा था पर बसेरा तेरा जब निकले खुदको ढूंढने हर गली में मुलाकात हुई तुझसे सोचा तुझसे ही खुद का पता पूछ लूँ पर तेरी गलियों में इस कदर गुम हुए मानो…

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