घर

दीवारों की दरारों मेंछुपी ज़र्द यादेंपास जाकर देखाकभी मेरा बचपनसतह पर तैरताकभी दादी का बुढ़ापाकनखियों से झाँकताखिड़कियों के पार सेसन्नाटे ताकतेकभी होली में रंगेमाँ-बाबा की झलकतो कभी बिदाई में सजीअन्नू का अक्सखाली कमरों में गूंजतेहँसी के पटाखेकभी पापा के ठहाकेतो कभी दादा केकहानी-किस्सेएक एकड़ उस ज़मीं मेंहज़ारों यादें दफ़्नकभी वो मन बहलातेतो कभी कितना तरसाते

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बसेरा…

चुपके से दबे पाओं आकर मेरे दिल में तुम्हारी बातें कुछ ऐसे बसेरा कर गयीं की आज मुझसे ज़्यादा कहीं तुम हो झलकती उन आइनों से जिनमें मैं कभी खुदको तलाशता था ~~~~~ आशा सेठ

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